दो ज़िंदगियाँ, एक मकसद।
अट्ठाईस साल अर्थशास्त्र पढ़ाते हुए और अपना स्कूल खुद खड़ा करके चलाते हुए, उन्होंने सीखा कि लोग असल में फ़ैसले कैसे लेते हैं। और ज़िंदगी भर ज्योतिष, अंक और साँस के साथ रहकर यह भी सीखा कि उन्हें अच्छे फ़ैसले लेने में कैसे मदद करें।
अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर वक़्त डॉ. सरिता नागपाल ने ऐसे कामों में बिताया जहाँ हर चीज़ नापी-तौली जा सकती है। उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की, प्रोफ़ेसर बनकर पढ़ाया, और फिर 1991 में अपना स्कूल खड़ा किया, 2019 तक उसकी प्रिंसिपल रहीं। एक वक़्त में पाँच सौ से ज़्यादा बच्चे: उनके रिपोर्ट कार्ड, उनके माँ-बाप, उनके आँसू और उनकी कामयाबियाँ।
अट्ठाईस साल तक आम घर-परिवारों का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने वह सीखा जो कोई कुंडली नहीं सिखा सकती: लोग असल में फ़ैसले कैसे लेते हैं। कैसे लेना चाहिए नहीं, बल्कि कैसे लेते हैं, जब करियर, शादी या बच्चे का भविष्य दाँव पर हो।
कैसे लेना चाहिए नहीं, बल्कि कैसे लेते हैं।
उसी ज़िंदगी के साथ-साथ उन्होंने उन विद्याओं की तालीम ली जिन पर उनकी दादी की पीढ़ी भरोसा करती थी: ज्योतिष, अंक विज्ञान, और शिव स्वरोदय परंपरा से आई साँस की योग-साधना, स्वर विज्ञान।
आज वे दोनों ज़िंदगियाँ एक ही मेज़ पर ले आती हैं: नाप-तौल का अनुशासन और एक शिक्षक का सब्र, उन सबसे पुराने सवालों के लिए जो लोग अपने साथ लिए चलते हैं। उनका काम मार्गदर्शन है: व्यावहारिक, अपनेपन से भरा, और इस बारे में ईमानदार कि क्या जाना जा सकता है और क्या नहीं। वे चमत्कार का वादा नहीं करतीं। साफ़ नज़र, सही वक़्त और कदम उठाने का हौसला ढूँढने में वे ज़रूर आपका साथ देंगी।
पीएच.डी., अर्थशास्त्रप्रोफ़ेसरसंस्थापक-प्रिंसिपल, 1991 से 2019स्वर साधक
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